हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल
अल्लाह के लिए योग्य है।
अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम
से साबित है कि आप ने फरमाया : “यहूदियों और ईसाईयों पर अल्लाह की धिक्कार
(लानत) हो, उन्हों ने अपने नबियों (ईश्दूतों) की क़ब्रों को मस्जिदें बना लीं।” इसे बुखारी ने अल-जनायज़ के अध्याय (हदीस संख्या : 330) में
और मुस्लिम ने अल-मसाजिद के अध्याय (हदीस संख्या: 529) में रिवायत किया है। तथा
आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से साबित है कि उम्मे सलमा और उम्मे हबीबा ने अल्लाह के
पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से एक गिर्जाघर और उसमें मौजूद तस्वीरों का चर्चा
किया जिसे उन दोनों ने हबशा के देश में देखा था, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम
ने फरमाया : “वे लोग ऐसे थे कि जब उनमें कोई नेक बंदा या नेक आदमी मर
जाता था तो वे उसकी क़ब्र पर एक मस्जिद बना लेते और उसके अंदर वे छवियाँ (तस्वीरे)
बना लेते, वे लोग अल्लाह के निकट सबसे बुरे मनुष्य हैं।” इसे बुखारी ने नमाज़ के अध्याय (हदीस संख्या : 434) और
मुस्लिम ने मसाजिद के अध्याय (हदीस संख्या : 528) में रिवायत किया है।
तथा मुस्लिम ने अपनी सहीह (जनायज़, हदीस
संख्या : 970) में जुनदुब बिन अब्दुल्लाह अल-बज्ली रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत
किया है कि उन्हों ने कहा : मैं ने अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को
फरमाते हुए सुना :
“अल्लाह तआला ने मुझे अपना खलील (दोस्त) बनाया है जिस प्रकार
कि इब्राहीम अलैहिस्सलाम को अपना खलील बनाया था, और यदि मैं अपनी उम्मत में से
किसी को खलील बनाता तो अबू-बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु को अपना खलील बनाता, सुनो! तुम
से पहले जो लोग थे वे अपने नबियों और सालिहीन (सदाचारियों) की क़ब्रों को मस्जिदें
(पूजा स्थल) बना लिया करते थे, अतः सावधान रहो! तुम क़ब्रों को मस्जिदें (पूजा
स्थल) न बनाना, मैं तुम्हें इससे रोकता हूँ।” (सहीह मुस्लिम)
तथा मुस्लिम ने जाबिर रज़ियल्लाहु अन्हु से
रिवायत किया है कि उन्हो ने कहा : “अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम
ने इस बात से मना किया है कि क़ब्र को पक्का (पलास्टर) किया जाये, उस पर बैठा जाए
और इस बात से कि उस पर निर्माण किया जाये।” (सहीह मुस्लिम,
जनाइज़, हदीस संख्या : 970).
ये सहीह हदीसें और इनके अर्थ में वर्णित
अन्य हदीसें सब की सब क़ब्रों पर मस्जिदें बनाने के निषेद्ध पर और ऐसा करने वाले के
धिक्कार पर तर्क स्थापित करती हैं, इसी तरह क़ब्रों पर निर्माण करने, उन पर गुंबद
बनाने और उन्हें पलास्टर करने के निषिद्ध होने पर दलाल करती हैं। क्योंकि यह उनके
साथ शिर्क करने और अल्लाह को छोड़कर उसके निवासियों की पूजा करने के कारणें में से
है, जैसा कि प्राचीन और वर्तमान काल में ऐसा घटित हो चुका है। अतः मुसलमानों पर
अनिवार्य है कि वे चाहे जहाँ भी रहते हों उस चीज़ से बचें जिससे अल्लाह के पैगंबर
सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सावधान किया है, और उस चीज़ से धोखे में न पड़ें जिसे
बहुत से लोगों ने किया है, क्योंकि सत्य मोमिन का गुमशुदा खज़ाना है जिसे वह जब भी
पाता है ले लेता है। और सत्य को किताब व सुन्नत के प्रमाणों के द्वारा परखा जाता
है, लोगों के विचारों और
उनके कार्यों से नहीं जाना जाता है, और पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम
और आपके दोनों साथियों रज़ियल्लाहु अन्हुमा को मस्जिद में नहीं दफनाया गया था,
बल्कि वे आयशा के घर में दफन किए गए थे, किंतु जब पहली शताब्दी में वलीद बिन
अब्दुल मलिक के समय काल में मस्जिद के अंदर विस्तार किया गया तो कमरे को मस्जिद
में दाखिल कर लिया गया। यहाँ उसके इस काम को मस्जिद में दफन करने के हुक्म में
नहीं समझा जायेगा क्योंकि पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और आपके दोनों साथियों
को मस्जिद में स्थानांतरित नहीं किया गया है बल्कि जिस कमरे में वे थे उसे विस्तार
के उद्देश्य से मस्जिद में दाखिल कर लिया गया है, इसलिए इसके अंदर किसी भी व्यक्ति
के लिए क़ब्रों पर निर्माण करने, या उस पर
मस्जिदें बनाने, या उसमें दफन करने के लिए कोई हुज्जत (प्रमाण) नहीं है, उन हदीसों
के आधार पर जिन्हें मैं ने अभी उल्लेख की हैं जो इस काम से रोकने वाली हैं, और
वलीद के काम में उस चीज़ पर कोई हुज्जत नहीं है जो अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु
अलैहि व सल्लम से प्रमाणित सुन्नत के विरूद्ध है, और अल्लाह तआला ही तौफीक़ प्रदान
करनेवाला है।